भौम दोष शांति एवं वैवाहिक बाधा निवारण
विवाह में अत्यधिक विलंब, दांपत्य कलह, अकाल संकट का सटीक समाधान एवं उज्जैन मंगलनाथ भात पूजा।
।। ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः । धरणीगर्भसंभूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम् ।।
आचार्य जी से कुंडली जांचें व समाधान पाएं"लग्ने व्यये च पाताले जामित्रे चाष्टमे कुजे। कन्या भर्तुर्विनाशाय भर्तुः कन्या विनाशिनी॥"
— बृहत्पाराशर होराशास्त्र, मुहूर्तचिंतामणि एवं जातक परिजात
वैदिक ज्योतिष में मंगल को नवग्रहों का सेनापति, शौर्य, पराक्रम, भूमि और रक्त का अधिष्ठाता माना गया है। परंतु जब यही अंगारक मंगल कुंडली के लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में विराजित होता है, तो इसकी अत्यधिक उष्ण और आक्रामक रश्मियां जातक के वैवाहिक सुख, चित्त की शांति और जीवनसाथी की आयु को प्रभावित करती हैं। इसे ही लोकभाषा में 'मांगलिक दोष' अथवा 'भौम दोष' कहा जाता है। यद्यपि मांगलिक होना कोई अभिशाप नहीं है, महर्षियों ने इसके परिहार, कुंभ विवाह, अर्क विवाह और अंगारक शांति की ऐसी अचूक विधियां दी हैं जिनसे दांपत्य जीवन पूर्ण आनंद और दीर्घायु से परिपूर्ण हो जाता है।
मांगलिक दोष को लेकर समाज में अनेक भ्रांतियां और भय फैलाया गया है। सच्चाई यह है कि 50% से अधिक कुंडलियों में मांगलिक दोष किसी न किसी नियम से स्वतः 'भंग' हो चुका होता है।
पं० राधेश्याम मिश्र (28+ वर्षों का अनुभव) द्वारा आपकी कुंडली का सूक्ष्म परीक्षण कर यह निश्चित किया जाएगा कि मंगल दोष सक्रिय है या निष्प्रभावी, और आवश्यकता पड़ने पर वैदिक शांति का प्रामाणिक विधान संपन्न कराया जाएगा।
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वैदिक ज्योतिष में मंगल को तीन विशेष पूर्ण दृष्टियां प्राप्त हैं—चतुर्थ दृष्टि, सप्तम दृष्टि एवं अष्टम दृष्टि। जब मंगल लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में बैठता है, तो उसकी दृष्टियों का सीधा आघात सप्तम भाव (विवाह), अष्टम भाव (मांगल्य व आयु) अथवा द्वितीय भाव (कुटुंब व वाणी) पर पड़ता है। आइए प्रत्येक भाव के मंगल के प्रभाव को विस्तार से समझें:
दृष्टियां: चतुर्थ (सुख), सप्तम (विवाह) एवं अष्टम (आयु) भाव पर।
फलित प्रभाव: जातक अत्यधिक क्रोधी, हठी, आक्रामक और स्वाभिमानी होता है। लग्नस्थ मंगल सीधे सप्तम भाव को देखता है, जिससे जीवनसाथी के साथ सामंजस्य बिठाना अत्यंत कठिन हो जाता है। चतुर्थ भाव पर दृष्टि से गृह शांति का ह्रास होता है और अष्टम दृष्टि जीवनसाथी के स्वास्थ्य को कमजोर करती है।
दृष्टियां: सप्तम (विवाह), दशम (कार्यक्षेत्र) एवं एकादश (लाभ) भाव पर।
फलित प्रभाव: चतुर्थ भाव गृहस्थ सुख, माता और वाहन का स्थान है। यहां बैठा मंगल पारिवारिक जीवन में निरंतर अशांति और क्लेश पैदा करता है। सप्तम भाव पर सीधी दृष्टि पड़ने से पति-पत्नी में शारीरिक व मानसिक आकर्षण कम होता है और घर में सदैव तनावपूर्ण वातावरण बना रहता है।
दृष्टियां: दशम (कर्म), प्रथम (लग्न) एवं द्वितीय (कुटुंब) भाव पर।
फलित प्रभाव: यह मांगलिक दोष का सर्वाधिक संवेदनशील स्थान माना गया है क्योंकि सप्तम भाव स्वयं दांपत्य का घर है। यहां क्रूर मंगल की उपस्थिति जीवनसाथी के साथ निरंतर झगड़े, तलाक, अलगाव या जीवनसाथी के गंभीर रोग का कारण बनती है। द्वितीय भाव पर दृष्टि से वाणी में कड़वाहट आती है।
दृष्टियां: एकादश (लाभ), द्वितीय (कुटुंब व धन) एवं तृतीय (पराक्रम) भाव पर।
फलित प्रभाव: शास्त्रों में अष्टम भाव के मंगल को 'अति प्रबल मांगलिक दोष' माना गया है। यह स्त्री जातक की कुंडली में सौभाग्य व वैधव्य का भाव है और पुरुष जातक की कुंडली में आयु का भाव है। यहां मंगल होने पर जीवनसाथी पर प्राण संकट, आकस्मिक दुर्घटना, गुप्त रोग और ससुराल पक्ष से घोर प्रताड़ना की आशंका रहती है।
दृष्टियां: तृतीय (पराक्रम), षष्ठ (रोग व शत्रु) एवं सप्तम (विवाह) भाव पर।
फलित प्रभाव: द्वादश भाव शयन सुख, भोग और गुप्त व्यय का स्थान है। यहां मंगल होने पर पति-पत्नी के मध्य अंतरंग संबंधों में अरुचि, शंका, व्यभिचार का अंदेशा अथवा आर्थिक दिवालियापन के कारण दांपत्य जीवन टूटता है। षष्ठ भाव पर दृष्टि से जीवनसाथी अक्सर रक्त या उदर रोगों से पीड़ित रहता है।
आंशिक मांगलिक दोष: जब मंगल केवल लग्न या द्वादश भाव में बैठा हो और उस पर किसी शुभ ग्रह (जैसे बृहस्पति या चंद्रमा) की दृष्टि हो, अथवा मंगल मित्र राशि में हो, तो इसे आंशिक या सौम्य मांगलिक कहा जाता है। इसमें दोष का प्रभाव केवल स्वभाव की उग्रता तक सीमित रहता है।
पूर्ण एवं प्रबल मांगलिक दोष: जब मंगल सप्तम या अष्टम भाव में नीच राशि (कर्क), शत्रु राशि में बैठा हो, पाप ग्रहों (शनि, राहु या सूर्य) से युत या दृष्ट हो और उस पर किसी शुभ ग्रह का प्रभाव न हो, तो यह 'अति प्रबल मांगलिक दोष' बनता है। इसके लिए विवाह पूर्व कुंभ/अर्क विवाह एवं वैदिक शांति अनिवार्य होती है।
28 वर्ष की आयु का सिद्धांत: कई ज्योतिषी यह दावा करते हैं कि 28 वर्ष के बाद मांगलिक दोष समाप्त हो जाता है। शास्त्र सम्मत तथ्य यह है कि 28 वर्ष में मंगल का प्राकृतिक प्रभाव परिपक्व होकर शांत होता है, परंतु यदि कुंडली में योग अत्यंत मारक हो तो शांति पूजा के बिना विवाह करना जोखिम भरा हो सकता है।
महर्षि पाराशर, वराहमिहिर एवं कालिदास रचित ग्रंथों में मांगलिक दोष के परिहार के स्पष्ट नियम दिए गए हैं। यदि आपकी कुंडली में निम्नलिखित में से कोई भी एक योग उपस्थित है, तो आपका मांगलिक दोष स्वतः निष्प्रभावी माना जाता है:
जब कुंडली में मांगलिक दोष अत्यंत उग्र हो और उसका कोई प्राकृतिक परिहार न बन रहा हो, तो सनातन परंपरा में ऋषियों ने 'प्रतीकात्मक विवाह' का विधान किया है। यह विधान जातक के प्रथम विवाह के अशुभ प्रारब्ध को किसी अचेतन या दिव्य माध्यम पर अंतरित कर देता है, जिससे वास्तविक मनुष्य के साथ होने वाला विवाह सर्वथा दोषमुक्त और मंगलमय हो जाता है:
किसके लिए: जब कन्या प्रबल मांगलिक हो और उसके वैधव्य या विवाह टूटने का भय हो।
विधि: शुभ मुहूर्त में कन्या का शास्त्रोक्त विवाह मिट्टी के घड़े (कुंभ) में स्थापित भगवान विष्णु की प्रतिमा से कराया जाता है। इस कलश में सप्तमृत्तिका, तीर्थ जल, पल्लव और स्वर्णिम विष्णु प्रतिमा रखी जाती है। संपूर्ण वैदिक विवाह संस्कार (हल्दी, फेरे, कन्यादान, मांगलिक मंत्रोच्चार) संपन्न कराने के पश्चात कलश का विसर्जन कर दिया जाता है। इस प्रकार कन्या का प्रथम विवाह भगवान विष्णु से संपन्न होकर दोष कलश के साथ विसर्जित हो जाता है।
किसके लिए: जब वर (पुरुष) प्रबल मांगलिक हो और पत्नी की आयु या सुख पर भारी संकट हो।
विधि: शनिवार, रविवार या हस्त नक्षत्र के शुभ मुहूर्त में वर का प्रतीकात्मक विवाह मदार (आक/अर्क) के पौधे के साथ कराया जाता है। अर्क वृक्ष सूर्य का प्रतीक है और अग्नि तत्व को समाहित करने की क्षमता रखता है। वैदिक मंत्रों से अर्क वृक्ष को वधू मानकर सात फेरे और सूत्रवेष्ठन किया जाता है। इसके पश्चात अर्क वृक्ष को प्रणाम कर दोष विसर्जन कर दिया जाता है। इसके बाद होने वाला दूसरा विवाह पूर्ण सुरक्षित रहता है।
मध्य प्रदेश की धर्मधरा अवंतिका (उज्जैन) में शिप्रा नदी के तट पर स्थित श्री मंगलनाथ मंदिर पूरे विश्व में मंगल ग्रह की जन्मभूमि माना जाता है। मत्स्य पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार जब भगवान शिव ने अंधकासुर दैत्य का वध किया, तब उनके मस्तक से गिरी पसीने की बूंद से पृथ्वी फट गई और रक्तवर्ण बालक के रूप में भौम (मंगल) का प्राकट्य हुआ।
भात पूजा का रहस्य: मंगल ग्रह का मूल स्वभाव अत्यंत उष्ण, क्रोधी और ज्वलनशील है। आयुर्वेद और वैदिक कर्मकांड में पके हुए चावल (भात) को पूर्ण शीतलता और चंद्र तत्व का प्रतीक माना गया है। मंगलनाथ मंदिर में शिवलिंग स्वरूप मंगल देव पर मंत्रोच्चार पूर्वक पके हुए शीतल चावल, दही, पंचामृत और भांग-चंदन का लेप किया जाता है। इस 'भात पूजा' से मंगल देव का अंगारक ताप तत्काल शांत होकर सौम्यता में बदल जाता है, जिससे जातक के वैवाहिक जीवन की समस्त बाधाएं सदा के लिए भस्म हो जाती हैं।
वैदिक अनुष्ठानों के अतिरिक्त जातक यदि अपने नित्य जीवन में शास्त्रसम्मत सात्विक उपायों को अपनाए, तो मंगल की शुभ ऊर्जा बलवान होकर पराक्रम, समृद्धि और पारिवारिक सुख प्रदान करती है:
प्रतिदिन प्रातःकाल लाल चंदन या मूंगे की माला से 1 माला मंत्र जप करें:
।। ॐ अङ्गारकाय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात् ।।
अथवा तांत्रिक बीज मंत्र: ।। ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः ।। (न्यूनतम 108 बार)।
मंगलवार के दिन हनुमान जी के मंदिर में चमेली के तेल का सिंदूरी दीपक जलाकर ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ करें। हनुमान चालीसा का 7 बार पाठ अथवा सुंदरकांड का पाठ करने से मंगल की समस्त क्रूरता समाप्त होकर वह रक्षक बन जाते हैं।
मूंगा केवल मेष, वृश्चिक, धनु, मीन और सिंह लग्न वाले जातकों के लिए ही प्रशस्त होता है। यदि मंगल कुंडली में अशुभ भाव का स्वामी हो, तो मूंगा कभी न पहनें। उचित परीक्षण के उपरांत ही सवा छह से सवा आठ रत्ती का इटैलियन त्रिकोणीय मूंगा तांबे या सोने में अनामिका उंगली में धारण करें।
मांगलिक दोष के नाम पर भयभीत करने के बजाय हम प्रामाणिक शास्त्रीय आधार पर समस्या की जड़ को पहचानकर उसका स्थाई समाधान प्रदान करते हैं। आचार्य पं० राधेश्याम मिश्र के सानिध्य में आपको मिलता है:
लड़का और लड़की दोनों की जन्म तिथि, समय व जन्म स्थान व्हाट्सएप पर भेजें। आचार्य जी दोनों की कुंडलियों का तुलनात्मक अध्ययन कर मांगलिक दोष के वास्तविक प्रभाव एवं परिहार के उपाय बताएंगे।
28+ वर्षों का दीर्घ वैदिक ज्योतिष, कर्मकांड एवं विवाह मिलान का अनुभव। AIFAS एवं AICAS से गोल्ड मेडलिस्ट। मांगलिक दोष निवारण, कुंभ विवाह, अर्क विवाह एवं दांपत्य सुख शांति अनुष्ठानों में निष्णात। अयोध्या धाम से देश-विदेश में ऑनलाइन व प्रत्यक्ष परामर्श उपलब्ध।
पंडित जी के बारे में अधिक जानेंज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब जन्मपत्रिका के लग्न (प्रथम), चतुर्थ, सप्तम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में मंगल ग्रह स्थित होता है, तब जातक की कुंडली में 'मांगलिक दोष' या 'भौम दोष' का निर्माण होता है। दक्षिण भारतीय ज्योतिष में द्वितीय भाव के मंगल को भी कुज दोष माना जाता है। इन भावों में मंगल की क्रूर दृष्टि दांपत्य, स्वास्थ्य, आयु और सुख भाव पर पड़ने से वैवाहिक जीवन में असंतुलन उत्पन्न होता है।
यह एक बहुत बड़ी जनसाधारण भ्रांति है। शास्त्र सम्मत सत्य यह है कि मंगल ग्रह की प्राकृतिक परिपक्वता (Maturity Age) 28 वर्ष मानी गई है, जिससे व्यक्ति के स्वभाव का अनियंत्रित क्रोध और उतावलापन कुछ सीमा तक शांत हो जाता है। परंतु यदि मंगल अष्टम या सप्तम भाव में अत्यंत नीच या पीड़ित होकर बैठा हो, तो उसका दोष 28 वर्ष के बाद भी स्वतः समाप्त नहीं होता। उसके लिए विधिवत वैदिक शांति या परिहार आवश्यक होता है।
जब मांगलिक कन्या के विवाह में वैधव्य योग या भारी अमंगल की आशंका हो, तो वास्तविक विवाह से पूर्व कन्या का प्रतीकात्मक विवाह भगवान विष्णु स्वरूप मिट्टी के कलश (घट) या शालिग्राम जी से कराया जाता है, जिसे 'कुंभ विवाह' कहते हैं। वहीं यदि वर (लड़के) की कुंडली में प्रबल मांगलिक दोष हो, तो उसका प्रतीकात्मक विवाह मदार (आक/अर्क) के पौधे से कराया जाता है, जिसे 'अर्क विवाह' कहते हैं। इससे मंगल का समस्त अमंगल फल उस प्रतीकात्मक माध्यम पर कट जाता है।
हाँ, बिल्कुल हो सकता है, बशर्ते गैर-मांगलिक जातक की कुंडली में मंगल के समतुल्य कोई अन्य पापी ग्रह (जैसे शनि, राहु या सूर्य) 1, 4, 7, 8 या 12वें भाव में स्थित हो, अथवा दोनों की कुंडलियों में मांगलिक दोष भंग करने वाले शास्त्रीय योग (जैसे गुरु की दृष्टि, स्वगृही मंगल) उपस्थित हों। पूर्ण गुण मिलान और ग्रह साम्य (दोष साम्य) के उपरांत विवाह पूर्णतः सुखद रहता है।
स्कंद पुराण के अवंतिका खंड के अनुसार उज्जैन नगरी भगवान मंगल देव की प्राकट्य स्थली (जन्मभूमि) है और यह कर्क रेखा पर स्थित है। मंगल अग्नि तत्व और अत्यधिक उष्ण प्रकृति का ग्रह है। उबले हुए चावल (भात) शीतलता का प्रतीक हैं। जब मंगलनाथ मंदिर में शिवलिंग स्वरूप मंगल देव का पके हुए शीतल चावल, दही, दूध और पंचामृत से अभिषेक किया जाता है, तो मंगल का अंगारक ताप तत्काल शांत हो जाता है।
बिना कुंडली दिखाए कभी भी मूंगा नहीं पहनना चाहिए। यदि मंगल कुंडली में मारक या अशुभ भावों (जैसे 6, 8, 12 या नीच राशि कर्क) का स्वामी होकर बैठा हो, तो मूंगा पहनने से मंगल की नकारात्मक ऊर्जा कई गुना बढ़ जाएगी जिससे दुर्घटना, रक्तचाप और तलाक का खतरा बढ़ सकता है। मूंगा केवल तभी पहना जाता है जब मंगल लग्नेश, पंचमेश या भाग्येश होकर कमजोर अवस्था में हो।
समय रहते शास्त्रोक्त कुंभ/अर्क विवाह एवं वैदिक शांति कराएं और एक सुखी, दीर्घायु दांपत्य का निर्माण करें।
हमारे सभी वैवाहिक उपाय विशुद्ध पाराशरीय ज्योतिष एवं सनातन कर्मकांड पद्धति पर आधारित हैं।